Jumme Ke Din Ki Sunnatein: जुमा (शुक्रवार) हफ़्ते का सबसे अफ़ज़ल दिन है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: “सबसे बेहतरीन दिन जिस पर सूरज निकलता है, जुमा का दिन है; इसी दिन आदम (अलैहिस्सलाम) पैदा किए गए, इसी दिन जन्नत में दाख़िल किए गए, और इसी दिन क़यामत क़ायम होगी।” (सहीह मुस्लिम: 854)
इस पोस्ट में जुमे के दिन की 12 सुन्नतें और आदाब हदीस के हवाले के साथ हैं, साथ में दुआ क़बूल होने की घड़ी, सूरह कहफ़ की फ़ज़ीलत, और जुमा छोड़ने की वईद (चेतावनी) भी।
जुमे की सुन्नतें: एक नज़र में (चेकलिस्ट)
| # | सुन्नत / अदब | हवाला |
|---|---|---|
| 1 | ग़ुस्ल करना | बुख़ारी: 877 |
| 2 | मिस्वाक करना और ख़ुशबू लगाना | बुख़ारी: 880 |
| 3 | अच्छे (साफ़) कपड़े पहनना | अबू दाऊद: 1078 |
| 4 | मस्जिद जल्दी जाना | बुख़ारी: 881 |
| 5 | पैदल जाना, इमाम के क़रीब बैठना | अबू दाऊद: 345 |
| 6 | लोगों की गर्दनें न फलाँगना | अबू दाऊद: 1118 |
| 7 | ख़ामोशी से ख़ुतबा सुनना | बुख़ारी: 934 |
| 8 | दुरूद शरीफ़ ज़्यादा पढ़ना | अबू दाऊद: 1047 |
| 9 | सूरह कहफ़ पढ़ना | हाकिम, बैहक़ी |
| 10 | दुआ की क़बूलियत की घड़ी तलाशना | बुख़ारी: 935 |
| 11 | फ़ज्र में सूरह सज्दा और सूरह दहर (इमाम के लिए) | बुख़ारी: 891 |
| 12 | सिर्फ़ जुमे को अकेला रोज़ा न रखना | बुख़ारी: 1985 |

1. ग़ुस्ल करना
नबी ﷺ ने फ़रमाया: जब तुम में से कोई जुमे (की नमाज़) के लिए आए, तो ग़ुस्ल करे। (सहीह बुख़ारी: 877) ग़ुस्ल का सही तरीका: ग़ुस्ल का तरीका
2. मिस्वाक, ख़ुशबू और अच्छे कपड़े
जुमे के दिन हर बालिग़ पर ग़ुस्ल है, और ये कि मिस्वाक करे और जो ख़ुशबू मिले लगाए। (सहीह बुख़ारी: 880) अपने सबसे साफ़ और अच्छे कपड़े पहनें। (अबू दाऊद: 1078)
3. मस्जिद जल्दी जाना
नबी ﷺ ने फ़रमाया: जो जुमे के दिन ग़ुस्ल करके पहली घड़ी में (मस्जिद) जाए, गोया उसने ऊँट की क़ुर्बानी की; दूसरी घड़ी में जाए तो गाय की; तीसरी में मेंढे की; चौथी में मुर्ग़ी की; और पाँचवीं में अंडे की। फिर जब इमाम (ख़ुतबे के लिए) निकलता है तो फ़रिश्ते (नाम लिखना बंद करके) ख़ुतबा सुनने आ जाते हैं। (सहीह बुख़ारी: 881)
4. ख़ामोशी से ख़ुतबा सुनना
अगर तुमने जुमे के दिन, इमाम के ख़ुतबे के दौरान, अपने साथी से (सिर्फ़ इतना भी) कहा कि “चुप रहो”, तो तुमने लग़्व (बेकार) काम किया। (सहीह बुख़ारी: 934) इसलिए ख़ुतबे के दौरान मोबाइल देखना, बात करना, सब छोड़ दें। लोगों की गर्दनें फलाँगकर आगे न बढ़ें। (अबू दाऊद: 1118)
5. दुरूद शरीफ़ ज़्यादा पढ़ना
नबी ﷺ ने फ़रमाया: तुम्हारे दिनों में सबसे अफ़ज़ल जुमे का दिन है, तो इस दिन मुझ पर ज़्यादा दुरूद भेजा करो, क्योंकि तुम्हारा दुरूद मुझ पर पेश किया जाता है। (अबू दाऊद: 1047) दुरूद-ए-इब्राहीम | दुरूद शरीफ़
6. सूरह कहफ़ पढ़ना
जो जुमे के दिन सूरह कहफ़ पढ़े, उसके लिए दो जुमों के बीच नूर (रोशनी) रौशन कर दिया जाता है। (हाकिम, बैहक़ी; शैख़ अलबानी ने सहीह कहा) ये जुमेरात की मग़रिब से जुमे की मग़रिब तक कभी भी पढ़ी जा सकती है।
7. दुआ क़बूल होने की घड़ी
नबी ﷺ ने जुमे के दिन का ज़िक्र किया और फ़रमाया: इसमें एक ऐसी घड़ी है कि जो मुसलमान बंदा उसमें खड़ा नमाज़ पढ़ रहा हो और अल्लाह से कुछ माँगे, अल्लाह उसे ज़रूर देता है। (सहीह बुख़ारी: 935)
ये घड़ी कब है, इस बारे में दो मशहूर क़ौल हैं: (1) इमाम के मिम्बर पर बैठने से नमाज़ ख़त्म होने तक (सहीह मुस्लिम: 853), और (2) अस्र के बाद आख़िरी घड़ी, यानी मग़रिब से पहले (अबू दाऊद: 1048)। इसलिए दोनों वक़्तों में ख़ूब दुआ करें।
8. जुमे के दिन की फ़ज़ीलत
- गुनाहों की माफ़ी: जो जुमे के दिन ग़ुस्ल करे, जितना हो सके पाकी हासिल करे, तेल या ख़ुशबू लगाए, मस्जिद जाए, दो लोगों के बीच न घुसे, जो मुक़द्दर हो नमाज़ पढ़े, और इमाम के ख़ुतबे के वक़्त चुप रहे, उसके इस जुमे से पिछले जुमे तक के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। (सहीह बुख़ारी: 883)
- हफ़्ते की ईद: जुमा मुसलमानों के लिए हफ़्ते की ईद है।
जुमा छोड़ने की वईद (चेतावनी)
नबी ﷺ ने फ़रमाया: लोग जुमा छोड़ने से बाज़ आ जाएँ, वरना अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देगा, फिर वो ग़ाफ़िलों में से हो जाएँगे। (सहीह मुस्लिम: 865) और जो बिना उज़्र (मजबूरी) के तीन जुमे लापरवाही से छोड़ दे, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है। (अबू दाऊद: 1052)
किन पर जुमा फ़र्ज़ नहीं?
जुमा हर बालिग़, आक़िल, आज़ाद, मुक़ीम (घर पर रहने वाले) मर्द पर फ़र्ज़ है, सिवाय चार के: ग़ुलाम, औरत, बच्चा और बीमार। (अबू दाऊद: 1067) मुसाफ़िर पर भी जुमा फ़र्ज़ नहीं। ये लोग ज़ुहर पढ़ेंगे, लेकिन अगर जुमे में शामिल हो जाएँ तो जुमा अदा हो जाएगा।
जुमे की नमाज़ की पूरी जानकारी: जुमा की नमाज़ का तरीका | जुमा की रकात (14) | जुमा की नियत
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
जुमे के दिन की सबसे अहम सुन्नत क्या है?
ग़ुस्ल करना, जल्दी मस्जिद जाना और ख़ामोशी से ख़ुतबा सुनना; इन पर गुनाहों की माफ़ी का वादा है (बुख़ारी: 883)।
जुमे के दिन दुआ क़बूल होने का वक़्त कौन सा है?
दो मशहूर क़ौल: इमाम के मिम्बर पर बैठने से नमाज़ ख़त्म होने तक (मुस्लिम: 853), और अस्र के बाद मग़रिब से पहले (अबू दाऊद: 1048)।
जुमे को सूरह कहफ़ कब पढ़ें?
जुमेरात की मग़रिब से जुमे की मग़रिब तक कभी भी।
क्या औरतों पर जुमा फ़र्ज़ है?
नहीं, औरतें ज़ुहर पढ़ें (अबू दाऊद: 1067)। लेकिन ग़ुस्ल, दुरूद, सूरह कहफ़ और दुआ की सुन्नतें उनके लिए भी हैं।
क्या सिर्फ़ जुमे का रोज़ा रख सकते हैं?
नबी ﷺ ने सिर्फ़ जुमे को अकेला रोज़ा रखने से मना किया, जब तक उससे एक दिन पहले या बाद में भी रोज़ा न रखे (बुख़ारी: 1985)।
ख़ुतबे के दौरान बात करना कैसा है?
मना है; यहाँ तक कि “चुप रहो” कहना भी लग़्व (बेकार) है (बुख़ारी: 934)।
आख़िरी बात
जुमा हर हफ़्ते गुनाहों की माफ़ी और दुआ क़बूल होने का मौक़ा लेकर आता है। इस चेकलिस्ट को सेव कर लें, और हर जुमे में ग़ुस्ल, जल्दी मस्जिद, दुरूद, सूरह कहफ़ और अस्र के बाद की दुआ को अपनी आदत बना लें।
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