Mitti Dene Ki Dua: क़ब्र पर तीन बार मिट्टी दी जाती है, और हर बार दुआ का एक हिस्सा पढ़ा जाता है। पहली बार “मिन्हा ख़लक़नाकुम”, दूसरी बार “व फ़ीहा नुईदुकुम” और तीसरी बार “व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा”। ये क़ुरआन की आयत है। (सूरह ताहा 20:55)
इस पोस्ट में आपको मिट्टी देने की दुआ अरबी, हिंदी, इंग्लिश और तर्जुमे के साथ मिलेगी। साथ ही क़ब्र पर मिट्टी देने का सुन्नत तरीका, मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ और दफ़न के बाद क्या करें, ये सब भी बताया गया है।
मिट्टी देने की दुआ एक नज़र में
| कब | क्या पढ़ें | मतलब |
|---|---|---|
| पहली बार | मिन्हा ख़लक़नाकुम | इसी (ज़मीन) से हमने तुम्हें पैदा किया |
| दूसरी बार | व फ़ीहा नुईदुकुम | और इसी में तुम्हें लौटाएँगे |
| तीसरी बार | व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा | और इसी से तुम्हें दोबारा निकालेंगे |
Mitti Dene Ki Dua in Arabic
مِنْهَا خَلَقْنٰكُمْ وَفِيْهَا نُعِيْدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرٰى

Mitti Dene Ki Dua in Hindi
पहली बार मिट्टी देने की दुआ
مِنْهَا خَلَقْنٰكُمْ
मिन्हा ख़लक़नाकुम: इसी (ज़मीन) से हमने तुम्हें पैदा किया।
दूसरी बार मिट्टी देने की दुआ
وَفِيْهَا نُعِيْدُكُمْ
व फ़ीहा नुईदुकुम: और इसी में हम तुम्हें लौटाएँगे।
तीसरी बार मिट्टी देने की दुआ
وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرٰى
व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा: और इसी से हम तुम्हें दोबारा निकालेंगे।
Mitti Dene Ki Dua in English
1st: Minha khalaqnakum
2nd: Wa feeha nu’eedukum
3rd: Wa minha nukhrijukum taratan ukhra
मिट्टी देने की दुआ का तर्जुमा और मतलब
इसी ज़मीन से हमने तुम्हें पैदा किया, इसी में तुम्हें लौटाएँगे, और इसी से तुम्हें दोबारा (क़यामत के दिन) निकालेंगे।
ये एक आयत इंसान की पूरी कहानी बता देती है: हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को मिट्टी से बनाया गया, मरने के बाद इंसान मिट्टी में जाता है, और क़यामत के दिन इसी मिट्टी से दोबारा उठाया जाएगा। मिट्टी देते वक़्त ये दुआ पढ़ना मय्यत के लिए दुआ भी है और हमारे लिए नसीहत भी।
क़ब्र पर मिट्टी देने का सुन्नत तरीका
हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि.) बताते हैं कि नबी ﷺ ने जनाज़े की नमाज़ पढ़ी, फिर क़ब्र के पास आए और सिर की तरफ़ से तीन बार (दोनों हाथों से) मिट्टी डाली। (इब्न माजा: 1565) हर बार ऊपर वाली आयत का हिस्सा पढ़ना उलमा ने मुस्तहब बताया है।
- मय्यत को क़ब्र में रखकर ऊपर से तख़्ते या ईंटें लगा दी जाएँ।
- क़ब्र के सिरहाने (सिर की तरफ़) खड़े हों।
- दोनों हाथों में मिट्टी लें और पहली बार डालते हुए पढ़ें: मिन्हा ख़लक़नाकुम।
- दूसरी बार मिट्टी डालते हुए पढ़ें: व फ़ीहा नुईदुकुम।
- तीसरी बार मिट्टी डालते हुए पढ़ें: व मिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा।
- फिर बाक़ी लोग फावड़े से मिट्टी डालकर क़ब्र पूरी करें।
ध्यान दें: अगर दुआ याद न हो तो सिर्फ़ “बिस्मिल्लाह” कहकर मिट्टी दे दें। दुआ पढ़ना मुस्तहब (बेहतर) है, फ़र्ज़ या वाजिब नहीं।
मय्यत को क़ब्र में उतारते वक़्त की दुआ
मिट्टी देने से पहले, जब मय्यत को क़ब्र में रखा जाए, तो ये पढ़ा जाता है: (अबू दाऊद: 3213, तिर्मिज़ी: 1046)
بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلٰى مِلَّةِ رَسُوْلِ اللّٰهِ
हिंदी: बिस्मिल्लाहि व अला मिल्लति रसूलिल्लाह
तर्जुमा: अल्लाह के नाम से और रसूलुल्लाह ﷺ के तरीके पर (हम इसे रखते हैं)।
दफ़न के बाद क्या करें?
नबी ﷺ जब दफ़न से फ़ारिग़ होते तो क़ब्र के पास ठहरते और फ़रमाते: “अपने भाई के लिए मग़फ़िरत माँगो और उसके लिए साबित क़दमी की दुआ करो, क्योंकि अभी उससे सवाल किया जा रहा है।” (अबू दाऊद: 3221)
- क़ब्र के पास कुछ देर ठहरें और मय्यत के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें।
- दुआ करें कि अल्लाह उसे मुनकर-नकीर के सवालों के जवाब में साबित क़दम रखे।
- फ़ातिहा पढ़कर ईसाल-ए-सवाब करें: क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने का तरीका
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
क़ब्र पर कितनी बार मिट्टी देनी चाहिए?
तीन बार, दोनों हाथों से, सिरहाने की तरफ़ से। ये नबी ﷺ के अमल से साबित है (इब्न माजा: 1565)।
मिट्टी देने की दुआ क़ुरआन में कहाँ है?
ये सूरह ताहा (20) की आयत 55 है।
अगर मिट्टी देने की दुआ याद न हो तो क्या करें?
“बिस्मिल्लाह” कहकर मिट्टी दे दें। दुआ पढ़ना बेहतर है, लेकिन ज़रूरी नहीं।
क्या औरतें क़ब्र पर मिट्टी दे सकती हैं?
हदीस में है कि औरतों को जनाज़े के साथ जाने से मना किया गया था, लेकिन सख़्ती से नहीं (बुख़ारी: 1278)। इसलिए आम तौर पर दफ़न और मिट्टी देने का काम मर्द ही करते हैं।
मिट्टी सिर की तरफ़ से क्यों दी जाती है?
नबी ﷺ ने सिर की तरफ़ से मिट्टी डाली थी (इब्न माजा: 1565), इसलिए यही सुन्नत तरीका है।
दफ़न के बाद कौन सी दुआ पढ़ें?
मय्यत के लिए मग़फ़िरत और साबित क़दमी की दुआ करें, जैसा नबी ﷺ ने हुक्म दिया (अबू दाऊद: 3221)।
आख़िरी बात
क़ब्र पर मिट्टी देना मय्यत के साथ हमारी आख़िरी ख़िदमत है। “मिन्हा ख़लक़नाकुम…” पढ़ते वक़्त ये याद रखें कि एक दिन हमें भी इसी मिट्टी में जाना है। ये दुआ ख़ुद याद करें और घर के मर्दों को भी सिखाएँ।
ये भी पढ़ें: जनाज़े की नमाज़ का तरीका | जनाज़े की दुआ | जनाज़े की नमाज़ की नियत | क़ब्र पर फ़ातिहा
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