Janaze Ki Dua: नमाज़-ए-जनाज़ा में तीसरी तकबीर के बाद मय्यत के लिए दुआ पढ़ी जाती है। बालिग़ (बड़े) मर्द या औरत के लिए दुआ है: “अल्लाहुम्मग़फ़िर लि हय्यिना व मय्यितिना…” (तिर्मिज़ी: 1024, अबू दाऊद: 3201)। नाबालिग़ लड़के और लड़की के लिए अलग दुआ है।
इस पोस्ट में तीनों दुआएँ (बालिग़, नाबालिग़ लड़का, नाबालिग़ लड़की) अरबी, हिंदी और तर्जुमे के साथ हैं, और साथ में नमाज़-ए-जनाज़ा की चारों तकबीरों में क्या पढ़ना है, उसकी टेबल भी है।
नमाज़-ए-जनाज़ा में कब क्या पढ़ें (हनफ़ी)
| तकबीर | क्या पढ़ें |
|---|---|
| पहली तकबीर | सना (सुब्हानकल्लाहुम्मा… व जल्ला सनाउका…) |
| दूसरी तकबीर | दुरूद-ए-इब्राहीम |
| तीसरी तकबीर | मय्यत के लिए दुआ (नीचे दी गई) |
| चौथी तकबीर | दोनों तरफ़ सलाम |
1. बालिग़ (बड़े) मर्द और औरत के जनाज़े की दुआ
اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا وَصَغِيْرِنَا وَكَبِيْرِنَا وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا، اَللّٰهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهٗ مِنَّا فَأَحْيِهٖ عَلَى الْإِسْلَامِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهٗ مِنَّا فَتَوَفَّهٗ عَلَى الْإِيْمَانِ



हिंदी: अल्लाहुम्मग़फ़िर लि हय्यिना व मय्यितिना व शाहिदिना व ग़ाइबिना व सग़ीरिना व कबीरिना व ज़-करिना व उन्साना, अल्लाहुम्मा मन अह्यैतहू मिन्ना फ़-अह्यिही अलल इस्लाम, व मन तवफ़्फ़ैतहू मिन्ना फ़-तवफ़्फ़हू अलल ईमान।
English: Allahummaghfir li hayyina wa mayyitina wa shahidina wa gha’ibina wa saghirina wa kabirina wa zakarina wa unsana, Allahumma man ahyaitahu minna fa-ahyihi ‘alal Islam, wa man tawaffaitahu minna fa-tawaffahu ‘alal iman.
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! हमारे ज़िंदों और मुर्दों को, हाज़िर और ग़ायब को, छोटों और बड़ों को, मर्दों और औरतों को बख़्श दे। ऐ अल्लाह! हम में से जिसे तू ज़िंदा रखे उसे इस्लाम पर ज़िंदा रख, और जिसे मौत दे उसे ईमान पर मौत दे।
एक और छोटी मसनून दुआ भी है जो नबी ﷺ ने एक जनाज़े पर पढ़ी: “अल्लाहुम्मग़फ़िर लहू वरहम्हु व आफ़िही वअ्फ़ु अन्ह” (ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, इस पर रहम कर, इसे आफ़ियत दे और इसे माफ़ कर दे)। (सहीह मुस्लिम: 963) औरत के लिए “लहा, वरहम्हा, व आफ़िहा, वअ्फ़ु अन्हा” कहें।
2. नाबालिग़ लड़के के जनाज़े की दुआ
اَللّٰهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطًا وَّاجْعَلْهُ لَنَا أَجْرًا وَّذُخْرًا وَّاجْعَلْهُ لَنَا شَافِعًا وَّمُشَفَّعًا
हिंदी: अल्लाहुम्मज-अल्हु लना फ़-रतंव वज-अल्हु लना अज्रंव व ज़ुख़्रंव वज-अल्हु लना शाफ़िअंव व मुशफ़्फ़आ
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! इस (बच्चे) को हमारे लिए आगे जाकर इंतज़ाम करने वाला बना, इसे हमारे लिए अज्र और (आख़िरत का) ज़ख़ीरा बना, और इसे हमारे हक़ में सिफ़ारिश करने वाला और ऐसा बना जिसकी सिफ़ारिश क़बूल हो।
3. नाबालिग़ लड़की के जनाज़े की दुआ
اَللّٰهُمَّ اجْعَلْهَا لَنَا فَرَطًا وَّاجْعَلْهَا لَنَا أَجْرًا وَّذُخْرًا وَّاجْعَلْهَا لَنَا شَافِعَةً وَّمُشَفَّعَةً
हिंदी: अल्लाहुम्मज-अल्हा लना फ़-रतंव वज-अल्हा लना अज्रंव व ज़ुख़्रंव वज-अल्हा लना शाफ़िअतंव व मुशफ़्फ़अह
तर्जुमा: वही जो ऊपर है, बस लड़की के लिए। ये दुआ हज़रत हसन बसरी (रह.) से मनक़ूल है और इमाम बुख़ारी ने इसे किताबुल जनाइज़ में ज़िक्र किया है।
जनाज़े में शामिल होने की फ़ज़ीलत
नबी ﷺ ने फ़रमाया: जो जनाज़े में नमाज़ तक शामिल रहे उसे एक क़ीरात सवाब मिलता है, और जो दफ़न तक साथ रहे उसे दो क़ीरात। पूछा गया: दो क़ीरात क्या हैं? फ़रमाया: दो बड़े पहाड़ों के बराबर। (सहीह बुख़ारी: 1325)
दफ़न के वक़्त की दुआएँ: मिट्टी देने की दुआ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
जनाज़े की दुआ किस तकबीर के बाद पढ़ी जाती है?
तीसरी तकबीर के बाद। पहली के बाद सना, दूसरी के बाद दुरूद, और चौथी के बाद सलाम।
जनाज़े की दुआ याद न हो तो क्या पढ़ें?
मय्यत के लिए कोई भी मग़फ़िरत की दुआ पढ़ सकते हैं, जैसे “अल्लाहुम्मग़फ़िर लहू वरहम्हु” (मुस्लिम: 963)। लेकिन मसनून दुआ याद करने की कोशिश करें।
औरत के जनाज़े की दुआ अलग है?
बालिग़ औरत के लिए वही दुआ है जो बालिग़ मर्द के लिए है (“अल्लाहुम्मग़फ़िर लि हय्यिना…”)। सिर्फ़ नाबालिग़ लड़की की दुआ अलग है।
नाबालिग़ बच्चे के जनाज़े में मग़फ़िरत की दुआ क्यों नहीं?
क्योंकि नाबालिग़ बच्चा गुनाहों से पाक होता है, इसलिए उसके लिए माँ-बाप के हक़ में सिफ़ारिश करने वाला बनने की दुआ की जाती है।
जनाज़े की नमाज़ में कितनी तकबीरें हैं?
चार तकबीरें, और इसमें रुकू और सज्दा नहीं होता।
जनाज़े की नमाज़ की नियत क्या है?
पूरी नियत यहाँ पढ़ें: जनाज़े की नमाज़ की नियत
आख़िरी बात
जनाज़े की दुआ हमारे मरहूम भाई-बहन के लिए आख़िरी तोहफ़ा है, और हमारे लिए भी नसीहत कि एक दिन हमें भी इसी तरह रुख़सत होना है। तीनों दुआएँ याद कर लें, ताकि किसी जनाज़े में मौक़ा न छूटे।
ये भी पढ़ें: जनाज़े की नमाज़ का तरीका | जनाज़े की नियत | मिट्टी देने की दुआ | दुरूद-ए-इब्राहीम
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