Sayyidul Istighfar: “सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार” का मतलब है इस्तिग़फ़ार (माफ़ी माँगने) की सरदार दुआ। नबी ﷺ ने फ़रमाया: जो इसे दिन में पूरे यक़ीन के साथ पढ़े और शाम से पहले मर जाए, वो जन्नत वालों में से है; और जो रात में यक़ीन के साथ पढ़े और सुबह से पहले मर जाए, वो जन्नत वालों में से है। (सहीह बुख़ारी: 6306)
इस पोस्ट में सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार अरबी, हिंदी, इंग्लिश और आसान तर्जुमे के साथ है, साथ में इसके हर हिस्से का मतलब, पढ़ने का वक़्त और याद करने का तरीका।
| बात | जानकारी |
|---|---|
| नाम | सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार (माफ़ी की सबसे अफ़ज़ल दुआ) |
| कब पढ़ें | सुबह (शाम से पहले) और शाम/रात (सुबह से पहले) |
| फ़ज़ीलत | यक़ीन के साथ पढ़कर उसी दिन/रात मौत आए तो जन्नत |
| हवाला | सहीह बुख़ारी: 6306 |

Sayyidul Istighfar in Arabic
اَللّٰهُمَّ أَنْتَ رَبِّيْ لَآ إِلٰهَ إِلَّآ أَنْتَ، خَلَقْتَنِيْ وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلٰى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوْذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوْءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوْءُ لَكَ بِذَنْبِيْ فَاغْفِرْ لِيْ، فَإِنَّهٗ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوْبَ إِلَّآ أَنْتَ
Sayyidul Istighfar in Hindi
अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी, ला इलाहा इल्ला अन्ता, ख़लक़्तनी व अना अब्दुका, व अना अला अह्दिका व वअ्दिका मस्ततअ्तु, अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअ्तु, अबूउ लका बि-निअ्मतिका अलय्या, व अबूउ लका बि-ज़म्बी फ़ग़फ़िर ली, फ़इन्नहू ला यग़फ़िरुज़ ज़ुनूबा इल्ला अन्ता।
Sayyidul Istighfar in English
Allahumma anta rabbi, la ilaha illa anta, khalaqtani wa ana ‘abduka, wa ana ‘ala ‘ahdika wa wa’dika mastata’tu, a’oozu bika min sharri ma sana’tu, abu’u laka bi ni’matika ‘alayya, wa abu’u laka bi zanbi faghfir li, fa innahu la yaghfiruz zunooba illa anta.
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार का तर्जुमा
ऐ अल्लाह! तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। और मैं अपनी ताक़त भर तेरे अहद (वादे) और तेरे वादे पर क़ायम हूँ। मैंने जो कुछ किया उसकी बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमतों का इक़रार करता हूँ, और अपने गुनाहों का भी इक़रार करता हूँ, तो मुझे बख़्श दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को नहीं बख़्शता।
इस दुआ के हर हिस्से का मतलब
| हिस्सा | मतलब |
|---|---|
| अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी, ला इलाहा इल्ला अन्ता | तौहीद का इक़रार: तू ही मेरा रब और माबूद है |
| ख़लक़्तनी व अना अब्दुका | बंदगी का इक़रार: तूने बनाया, मैं तेरा ग़ुलाम हूँ |
| व अना अला अह्दिका… मस्ततअ्तु | वादे पर क़ायम रहने का इरादा, अपनी ताक़त भर |
| अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअ्तु | अपने किए की बुराई से पनाह |
| अबूउ लका बि-निअ्मतिका… | नेमतों का शुक्र और गुनाहों का इक़रार |
| फ़ग़फ़िर ली… | माफ़ी की दरख़्वास्त, क्योंकि माफ़ करने वाला सिर्फ़ तू है |
इसे “सरदार” इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें तौबा की हर ज़रूरी चीज़ एक साथ है: अल्लाह की तारीफ़, बंदगी का इक़रार, नेमतों का शुक्र, गुनाह का इक़रार और माफ़ी की दरख़्वास्त।
कब और कैसे पढ़ें?
- सुबह फ़ज्र के बाद एक बार, और शाम मग़रिब के बाद या सोने से पहले एक बार।
- सिर्फ़ ज़बान से नहीं, मतलब को दिल में रखकर और “यक़ीन” के साथ पढ़ें, जैसा हदीस में शर्त है।
- याद करने के लिए इसे 6 हिस्सों (ऊपर की टेबल) में बाँटें और रोज़ एक हिस्सा याद करें।
और पढ़ें: पाँचवाँ कलमा अस्तग़फ़ार | सोने की दुआ | नमाज़ के बाद की दुआ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार क्या है?
इस्तिग़फ़ार की सबसे अफ़ज़ल दुआ, जो सहीह बुख़ारी (6306) में है।
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार कब पढ़ें?
दिन में (शाम से पहले) एक बार और रात में (सुबह से पहले) एक बार।
इसकी फ़ज़ीलत क्या है?
यक़ीन के साथ दिन में पढ़कर शाम से पहले, या रात में पढ़कर सुबह से पहले मौत आ जाए, तो वो जन्नत वालों में से है (बुख़ारी: 6306)।
क्या औरतें भी यही पढ़ेंगी?
हाँ, अल्फ़ाज़ वही रहेंगे।
क्या इसे नमाज़ में पढ़ सकते हैं?
सलाम से पहले आख़िरी क़ादे में दुआ के तौर पर पढ़ सकते हैं।
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार और अस्तग़फ़िरुल्लाह में क्या फ़र्क़ है?
“अस्तग़फ़िरुल्लाह” छोटा इस्तिग़फ़ार है, जबकि सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार पूरी और सबसे अफ़ज़ल दुआ है।
आख़िरी बात
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार दिन में दो बार, बस एक मिनट का अमल, और वादा जन्नत का। आज ही इसे सुबह-शाम की आदत बना लें।
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