Dua E Qunoot: दुआ-ए-क़ुनूत वो दुआ है जो वित्र की नमाज़ की तीसरी रकात में रुकू से पहले पढ़ी जाती है। हनफ़ी मसलक में ये दुआ है: “अल्लाहुम्मा इन्ना नस्तईनुका व नस्तग़फ़िरुका…”, और वित्र में क़ुनूत पढ़ना वाजिब है।
इस पोस्ट में दुआ-ए-क़ुनूत अरबी, हिंदी, इंग्लिश और तर्जुमे के साथ दी गई है। साथ ही दूसरी मशहूर क़ुनूत (अल्लाहुम्मह्दिनी), वित्र में पढ़ने का तरीका, और याद न हो या भूल जाएँ तो क्या करें, ये सब भी बताया गया है।
दुआ-ए-क़ुनूत एक नज़र में
| कब पढ़ें | वित्र की तीसरी रकात में, सूरह के बाद और रुकू से पहले |
| हुक्म | वाजिब (हनफ़ी) |
| याद न हो तो | “रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनह…” या तीन बार “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली” |
| भूल जाएँ तो | सज्दा-ए-सहव करें |
| रिवायत | हज़रत उमर (रज़ि.) से (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा, बैहक़ी) |

Dua E Qunoot in Arabic
اَللّٰهُمَّ إِنَّا نَسْتَعِيْنُكَ وَنَسْتَغْفِرُكَ وَنُؤْمِنُ بِكَ وَنَتَوَكَّلُ عَلَيْكَ وَنُثْنِيْ عَلَيْكَ الْخَيْرَ، وَنَشْكُرُكَ وَلَا نَكْفُرُكَ، وَنَخْلَعُ وَنَتْرُكُ مَنْ يَّفْجُرُكَ، اَللّٰهُمَّ إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَلَكَ نُصَلِّيْ وَنَسْجُدُ، وَإِلَيْكَ نَسْعٰى وَنَحْفِدُ، وَنَرْجُوْ رَحْمَتَكَ وَنَخْشٰى عَذَابَكَ، إِنَّ عَذَابَكَ بِالْكُفَّارِ مُلْحِقٌ
Dua E Qunoot in Hindi
अल्लाहुम्मा इन्ना नस्तईनुका व नस्तग़फ़िरुका व नुअमिनु बिका व नतवक्कलु अलैका व नुस्नी अलैकल ख़ैर, व नश्कुरुका व ला नक्फ़ुरुका, व नख़्लउ व नत्रुकु मंय यफ़्जुरुक। अल्लाहुम्मा इय्याका नअ्बुदु व लका नुसल्ली व नस्जुदु, व इलैका नस्आ व नह्फ़िदु, व नर्जू रहमतका व नख़्शा अज़ाबका, इन्ना अज़ाबका बिल कुफ़्फ़ारि मुल्हिक़।
Dua E Qunoot in English
Allahumma inna nasta’eenuka wa nastaghfiruka wa nu’minu bika wa natawakkalu ‘alaika wa nusni ‘alaikal khair, wa nashkuruka wa la nakfuruka, wa nakhla’u wa natruku many-yafjuruk. Allahumma iyyaka na’budu wa laka nusalli wa nasjudu, wa ilaika nas’a wa nahfidu, wa narju rahmataka wa nakhsha ‘azabaka, inna ‘azabaka bil kuffari mulhiq.
दुआ-ए-क़ुनूत का तर्जुमा
ऐ अल्लाह! हम तुझसे मदद माँगते हैं, तुझसे माफ़ी माँगते हैं, तुझ पर ईमान रखते हैं, तुझ पर भरोसा करते हैं, तेरी अच्छी तारीफ़ करते हैं, तेरा शुक्र अदा करते हैं और तेरी नाशुक्री नहीं करते, और जो तेरी नाफ़रमानी करे उससे अलग हो जाते हैं और उसे छोड़ देते हैं। ऐ अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं, तेरे ही लिए नमाज़ पढ़ते और सज्दा करते हैं, तेरी ही तरफ़ दौड़ते और लपकते हैं, तेरी रहमत की उम्मीद रखते हैं और तेरे अज़ाब से डरते हैं। बेशक तेरा अज़ाब काफ़िरों को पहुँचकर रहेगा।
दूसरी दुआ-ए-क़ुनूत (अल्लाहुम्मह्दिनी)
ये क़ुनूत नबी ﷺ ने अपने नवासे हज़रत हसन (रज़ि.) को वित्र में पढ़ने के लिए सिखाई थी। (अबू दाऊद: 1425, तिर्मिज़ी: 464) बहुत से लोग इसे भी पढ़ते हैं:
اَللّٰهُمَّ اهْدِنِيْ فِيْمَنْ هَدَيْتَ، وَعَافِنِيْ فِيْمَنْ عَافَيْتَ، وَتَوَلَّنِيْ فِيْمَنْ تَوَلَّيْتَ، وَبَارِكْ لِيْ فِيْمَا أَعْطَيْتَ، وَقِنِيْ شَرَّ مَا قَضَيْتَ، فَإِنَّكَ تَقْضِيْ وَلَا يُقْضٰى عَلَيْكَ، وَإِنَّهٗ لَا يَذِلُّ مَنْ وَّالَيْتَ، تَبَارَكْتَ رَبَّنَا وَتَعَالَيْتَ
हिंदी: अल्लाहुम्मह्दिनी फ़ीमन हदैत, व आफ़िनी फ़ीमन आफ़ैत, व तवल्लनी फ़ीमन तवल्लैत, व बारिक ली फ़ीमा अअ्तैत, व क़िनी शर्रा मा क़ज़ैत, फ़इन्नका तक़्ज़ी व ला युक़्ज़ा अलैक, व इन्नहू ला यज़िल्लु मंव वालैत, तबारक्ता रब्बना व तआलैत।
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मुझे हिदायत देकर उनमें शामिल कर जिन्हें तूने हिदायत दी, आफ़ियत देकर उनमें शामिल कर जिन्हें तूने आफ़ियत दी, मेरी सरपरस्ती कर उनके साथ जिनकी तूने सरपरस्ती की, जो तूने दिया उसमें बरकत दे, और तेरे फ़ैसले की बुराई से मुझे बचा। बेशक तू ही फ़ैसला करता है, तेरे ख़िलाफ़ फ़ैसला नहीं हो सकता, और जिसका तू दोस्त हो वो ज़लील नहीं होता। ऐ हमारे रब! तू बरकत वाला और बुलंद है।
वित्र में दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ने का तरीका
- वित्र की पहली दो रकात आम नमाज़ की तरह पढ़ें, दूसरी के बाद अत्तहिय्यात पढ़कर खड़े हों।
- तीसरी रकात में सूरह फ़ातिहा और कोई सूरह पढ़ें।
- फिर रुकू में जाने के बजाय “अल्लाहु अकबर” कहते हुए दोनों हाथ कानों तक उठाएँ।
- हाथ दोबारा बाँध लें और दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ें।
- फिर “अल्लाहु अकबर” कहकर रुकू करें और बाक़ी नमाज़ पूरी करें।
वित्र का पूरा तरीका: वित्र नमाज़ का तरीका | वित्र की नियत
दुआ-ए-क़ुनूत याद न हो तो क्या पढ़ें?
जब तक दुआ-ए-क़ुनूत याद न हो, उसकी जगह ये पढ़ सकते हैं: “रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनतंव व फ़िल आख़िरति हसनतंव व क़िना अज़ाबन नार”, या तीन बार “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली”। लेकिन जल्द से जल्द असल दुआ याद करने की कोशिश करें। रोज़ एक लाइन याद करें, दो हफ़्ते में पूरी याद हो जाएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
दुआ-ए-क़ुनूत कब पढ़ी जाती है?
वित्र की तीसरी रकात में, सूरह के बाद और रुकू से पहले, तकबीर कहकर हाथ उठाने के बाद।
क्या दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ना वाजिब है?
हनफ़ी मसलक में वित्र में क़ुनूत पढ़ना वाजिब है।
अगर दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ना भूल जाएँ तो?
अगर रुकू में चले गए और याद आया तो वापस न आएँ, आख़िर में सज्दा-ए-सहव कर लें। सज्दा-ए-सहव का तरीका
दुआ-ए-क़ुनूत याद न हो तो क्या पढ़ें?
“रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनह…” या तीन बार “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली” पढ़ लें।
क्या फ़ज्र में भी क़ुनूत पढ़ी जाती है?
हनफ़ी मसलक में आम दिनों में फ़ज्र में क़ुनूत नहीं पढ़ी जाती, सिर्फ़ वित्र में पढ़ी जाती है।
क्या औरतें भी दुआ-ए-क़ुनूत पढ़ेंगी?
हाँ, वित्र मर्द और औरत दोनों पर वाजिब है, और दोनों क़ुनूत पढ़ेंगे।
आख़िरी बात
दुआ-ए-क़ुनूत में बंदा अल्लाह से मदद, माफ़ी और रहमत माँगता है और उसकी इबादत का वादा करता है। इसे मतलब समझकर पढ़ें, ताकि रोज़ रात वित्र में ये वादा दिल से दोहराया जाए।
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