Karz Utarne Ki Dua in Hindi: क़र्ज़ से निजात की 3 मसनून दुआएँ

Karz Utarne Ki Dua: क़र्ज़ से निजात के लिए सबसे मशहूर मसनून दुआ है: “अल्लाहुम्मक्फ़िनी बि हलालिका अन हरामिक, व अग़निनी बि फ़ज़्लिका अम्मन सिवाक”। हज़रत अली (रज़ि.) ने फ़रमाया कि ये दुआ नबी ﷺ ने सिखाई है, और अगर तुम पर पहाड़ के बराबर भी क़र्ज़ हो तो अल्लाह उसे अदा करवा देगा। (तिर्मिज़ी: 3563)

इस पोस्ट में आपको क़र्ज़ उतारने की 3 मसनून दुआएँ अरबी, हिंदी, इंग्लिश और तर्जुमे के साथ मिलेंगी। साथ ही क़र्ज़ के बारे में इस्लाम की अहम हिदायतें और क़र्ज़ से निकलने के अमली तरीके भी बताए गए हैं, क्योंकि दुआ के साथ कोशिश भी ज़रूरी है।

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क़र्ज़ की दुआएँ एक नज़र में

दुआकब पढ़ेंहवाला
अल्लाहुम्मक्फ़िनी बि हलालिका अन हरामिक…हर नमाज़ के बाद, कभी भीतिर्मिज़ी: 3563
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल हम्मि वल हज़न…सुबह-शामबुख़ारी: 6369
रब्बि इन्नी लिमा अन्ज़ल्ता इलय्या मिन ख़ैरिन फ़क़ीरतंगी और ज़रूरत के वक़्तसूरह क़सस 28:24

1. Karz Utarne Ki Dua in Arabic

اَللّٰهُمَّ اكْفِنِيْ بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِيْ بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ

Karz Utarne Ki Dua in Hindi

अल्लाहुम्मक्फ़िनी बि हलालिका अन हरामिक, व अग़निनी बि फ़ज़्लिका अम्मन सिवाक

Karz Ki Dua in English

Allahummak-fini bi halalika ‘an haramik, wa aghnini bi fazlika ‘amman siwak

तर्जुमा

ऐ अल्लाह! अपने हलाल के ज़रिए मुझे हराम से बचा ले (हलाल रोज़ी को मेरे लिए काफ़ी कर दे), और अपने फ़ज़्ल से मुझे अपने सिवा हर किसी से बेनियाज़ कर दे।

इस दुआ का वाक़िया

एक ग़ुलाम (मुकातब) ने हज़रत अली (रज़ि.) से कहा कि मैं अपनी आज़ादी की रक़म अदा नहीं कर पा रहा, मेरी मदद कीजिए। हज़रत अली (रज़ि.) ने फ़रमाया: क्या मैं तुम्हें वो कलिमात न सिखा दूँ जो रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझे सिखाए थे? अगर तुम पर सीर पहाड़ के बराबर भी क़र्ज़ हो, तो अल्लाह तुम्हारी तरफ़ से उसे अदा करवा देगा। फिर ये दुआ सिखाई। (तिर्मिज़ी: 3563)

2. क़र्ज़ के बोझ और परेशानी से पनाह की दुआ

हज़रत अनस (रज़ि.) फ़रमाते हैं कि नबी ﷺ ये दुआ बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे: (सहीह बुख़ारी: 6369)

اَللّٰهُمَّ إِنِّيْ أَعُوْذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ

हिंदी: अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल हम्मि वल हज़न, वल अज्ज़ि वल कसल, वल बुख़्लि वल जुब्न, व ज़-लइद दैनि व ग़-लबतिर रिजाल

English: Allahumma inni a’oozu bika minal hammi wal hazan, wal ‘ajzi wal kasal, wal bukhli wal jubn, wa dala’id daini wa ghalabatir rijal

तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, बेबसी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, क़र्ज़ के बोझ से और लोगों के दबाव (ज़ुल्म) से।

इस दुआ में क़र्ज़ के साथ उसकी जड़ों से भी पनाह माँगी गई है: सुस्ती, बेबसी और फ़िक्र। अबू दाऊद (1555) की एक रिवायत में है कि एक सहाबी ग़म और क़र्ज़ में डूबे थे, नबी ﷺ ने उन्हें ऐसी ही दुआ सुबह-शाम पढ़ने को कहा, और वो फ़रमाते हैं कि अल्लाह ने मेरा ग़म दूर कर दिया और मेरा क़र्ज़ अदा करवा दिया।

3. तंगी और ज़रूरत के वक़्त की क़ुरआनी दुआ

जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) मिस्र से निकलकर मदयन पहुँचे, बेघर और ख़ाली हाथ थे, तब उन्होंने ये दुआ की और अल्लाह ने उन्हें घर, काम और परिवार सब अता किया: (सूरह क़सस 28:24)

رَبِّ إِنِّيْ لِمَآ أَنْزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيْرٌ

हिंदी: रब्बि इन्नी लिमा अन्ज़ल्ता इलय्या मिन ख़ैरिन फ़क़ीर
तर्जुमा: ऐ मेरे रब! जो भी भलाई तू मेरी तरफ़ उतारे, मैं उसका मोहताज हूँ।

क़र्ज़ के बारे में इस्लाम क्या कहता है?

इस्लाम में क़र्ज़ लेना जायज़ है, लेकिन उसे अदा करने की बहुत ताकीद है। ये हदीसें हर क़र्ज़दार को याद रखनी चाहिए:

  • नीयत साफ़ हो तो अल्लाह मदद करता है: जो लोगों का माल अदा करने की नीयत से ले, अल्लाह उसकी तरफ़ से अदा करवा देता है; और जो बर्बाद करने की नीयत से ले, अल्लाह उसे बर्बाद कर देता है। (सहीह बुख़ारी: 2387)
  • क़र्ज़ बहुत भारी है: शहीद के सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं, सिवाय क़र्ज़ के। (सहीह मुस्लिम: 1886)
  • मौत के बाद भी: मोमिन की रूह उसके क़र्ज़ की वजह से अटकी रहती है जब तक वो अदा न कर दिया जाए। (तिर्मिज़ी: 1078)
  • टालमटोल ज़ुल्म है: जिसके पास अदा करने की ताक़त हो, उसका टालना ज़ुल्म है। (सहीह बुख़ारी: 2287)
  • अच्छे तरीके से लौटाएँ: तुम में सबसे अच्छा वो है जो क़र्ज़ सबसे अच्छे तरीके से अदा करे। (सहीह बुख़ारी: 2305)

क़र्ज़ से निकलने के 6 अमली तरीके

दुआ के साथ कोशिश भी सुन्नत है। ये क़दम उठाएँ:

  1. हर क़र्ज़ लिख लें: किससे कितना लिया और कब लौटाना है। क़ुरआन ने भी क़र्ज़ को लिखने का हुक्म दिया है। (सूरह बक़रह 2:282)
  2. छोटे क़र्ज़ पहले चुकाएँ: इससे क़र्ज़ देने वालों की गिनती कम होती है और दिल का बोझ हल्का होता है।
  3. सूद (ब्याज) वाले क़र्ज़ से बचें: अल्लाह सूद को मिटाता है और सदक़े को बढ़ाता है। (सूरह बक़रह 2:276) सूद पर नया क़र्ज़ लेकर पुराना चुकाना मुसीबत बढ़ाता है।
  4. फ़िज़ूलख़र्ची बंद करें: जब तक क़र्ज़ है, ग़ैर-ज़रूरी ख़र्च टाल दें।
  5. क़र्ज़ देने वाले से सच बोलें: अगर वक़्त पर नहीं दे पा रहे तो पहले से बता दें और नई तारीख़ माँग लें। वादाख़िलाफ़ी न करें।
  6. इस्तिग़फ़ार की कसरत करें: क़ुरआन में है कि इस्तिग़फ़ार करने पर अल्लाह माल और औलाद से मदद करता है। (सूरह नूह 71:10-12)

क़र्ज़ देने वालों के लिए: अगर क़र्ज़दार तंगी में हो तो उसे आसानी तक मोहलत दो, और अगर माफ़ कर दो तो ये तुम्हारे लिए बेहतर है। (सूरह बक़रह 2:280)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क़र्ज़ उतारने की सबसे असरदार दुआ कौन सी है?

“अल्लाहुम्मक्फ़िनी बि हलालिका अन हरामिक, व अग़निनी बि फ़ज़्लिका अम्मन सिवाक” (तिर्मिज़ी: 3563)। इसके बारे में आया है कि पहाड़ जितना क़र्ज़ भी हो तो अल्लाह अदा करवा देता है।

क़र्ज़ की दुआ कब और कितनी बार पढ़ें?

हदीस में कोई तय गिनती नहीं है। हर नमाज़ के बाद और सुबह-शाम पाबंदी से पढ़ें, और दिल से अल्लाह से माँगें।

क्या सिर्फ़ दुआ से क़र्ज़ उतर जाएगा?

दुआ के साथ हलाल कमाई की कोशिश, फ़िज़ूलख़र्ची से बचना और अदा करने की पक्की नीयत भी ज़रूरी है। नीयत साफ़ हो तो अल्लाह मदद करता है (बुख़ारी: 2387)।

किसी और के क़र्ज़ के लिए दुआ कर सकते हैं?

हाँ, माँ-बाप, भाई-बहन या किसी भी मुसलमान के क़र्ज़ की अदायगी के लिए दुआ कर सकते हैं।

क्या मरने वाले का क़र्ज़ वारिसों को चुकाना होगा?

हाँ, मय्यत के छोड़े हुए माल से विरासत बाँटने से पहले उसका क़र्ज़ अदा किया जाता है। नबी ﷺ क़र्ज़दार की नमाज़-ए-जनाज़ा तब तक नहीं पढ़ाते थे जब तक क़र्ज़ का इंतज़ाम न हो जाए (बुख़ारी: 2289)।

क्या बैंक लोन (ब्याज वाला) लेना जायज़ है?

ब्याज (सूद) वाला लेन-देन इस्लाम में हराम है (सूरह बक़रह 2:275)। अपनी ख़ास मजबूरी के बारे में किसी मुफ़्ती से मसला ज़रूर पूछें।

आख़िरी बात

क़र्ज़ इंसान की नींद और सुकून छीन लेता है, लेकिन अल्लाह के ख़ज़ाने में कोई कमी नहीं। पक्की नीयत रखें, हर नमाज़ के बाद “अल्लाहुम्मक्फ़िनी बि हलालिका…” पढ़ें, हलाल कोशिश जारी रखें और सूद से बचें। इंशाअल्लाह रास्ता निकलेगा।

ये भी पढ़ें: सलातुल हाजत की नमाज़ | इस्तिख़ारा की दुआ | दुआ माँगने का तरीका

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