Ayat-e-Karima: आयत-ए-करीमा वो दुआ है जो हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) ने मछली के पेट के अंधेरों में की थी: “ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन” (सूरह अंबिया 21:87)। नबी ﷺ ने फ़रमाया: कोई मुसलमान किसी भी मामले में इन कलिमात से दुआ करे, अल्लाह उसकी दुआ क़बूल करता है। (तिर्मिज़ी: 3505)
इस पोस्ट में आयत-ए-करीमा अरबी, हिंदी, इंग्लिश और तर्जुमे के साथ है, साथ में हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) का वाक़िया, इसकी फ़ज़ीलत, और “सवा लाख आयत-ए-करीमा” के बारे में सही जानकारी।
| बात | जानकारी |
|---|---|
| नाम | आयत-ए-करीमा / दुआ-ए-यूनुस |
| क़ुरआन में | सूरह अंबिया 21:87 |
| किसने पढ़ी | हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम), मछली के पेट में |
| फ़ज़ीलत | हर परेशानी में दुआ क़बूल होने का वादा (तिर्मिज़ी: 3505) |

Ayat-e-Karima in Arabic
لَآ إِلٰهَ إِلَّآ أَنْتَ سُبْحٰنَكَ إِنِّيْ كُنْتُ مِنَ الظّٰلِمِيْنَ
Ayat-e-Karima in Hindi
ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन
Ayat-e-Karima in English
La ilaha illa anta subhanaka inni kuntu minaz zalimeen
तर्जुमा
(ऐ अल्लाह!) तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है, बेशक मैं ही ज़ालिमों (क़ुसूरवारों) में से था।
इस छोटी सी दुआ में तीन चीज़ें हैं: तौहीद (ला इलाहा इल्ला अन्ता), अल्लाह की पाकी (सुब्हानका), और अपनी ग़लती का इक़रार (इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन)। यही तीन चीज़ें दुआ की क़बूलियत की कुंजी हैं।
हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) का वाक़िया
हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) को नैनवा (इराक़) की क़ौम की तरफ़ भेजा गया। क़ौम ने बात नहीं मानी, तो वो अल्लाह के हुक्म का इंतज़ार किए बिना नाराज़ होकर निकल गए। कश्ती में सवार हुए, तूफ़ान आया, और क़ुरआ (लॉटरी) में उनका नाम निकला, तो उन्हें समुंदर में डाल दिया गया, जहाँ एक बड़ी मछली ने उन्हें निगल लिया। रात, समुंदर और मछली के पेट के तीन अंधेरों में उन्होंने ये दुआ की। अल्लाह फ़रमाता है: “तो हमने उसकी दुआ क़बूल की और उसे ग़म से निजात दी, और हम ईमान वालों को इसी तरह निजात देते हैं।” (सूरह अंबिया 21:88)
“और हम ईमान वालों को इसी तरह निजात देते हैं” (21:88) यानी ये वादा सिर्फ़ हज़रत यूनुस के लिए नहीं, हर उस मोमिन के लिए है जो इसी तरह अल्लाह को पुकारे।
आयत-ए-करीमा की फ़ज़ीलत
- दुआ क़बूल होती है: नबी ﷺ ने फ़रमाया: मछली वाले (यूनुस) की दुआ, जो उन्होंने मछली के पेट में की, “ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन”; कोई मुसलमान किसी भी मामले में इससे दुआ करे तो अल्लाह उसकी दुआ क़बूल करता है। (तिर्मिज़ी: 3505)
- ग़म और परेशानी से निजात: सूरह अंबिया 21:88 का वादा।
- तौबा का बेहतरीन तरीका: इसमें अपनी ग़लती का इक़रार है, जो तौबा की पहली शर्त है।
“सवा लाख आयत-ए-करीमा” के बारे में
भारत-पाकिस्तान में मुसीबत के वक़्त “सवा लाख (1,25,000) बार आयत-ए-करीमा का ख़त्म” कराने का रिवाज है। ये गिनती किसी सहीह हदीस से साबित नहीं है, बल्कि बुज़ुर्गों का तजुर्बा और रिवाज है। इसे पढ़ना अच्छा है, लेकिन इसे फ़र्ज़ या ज़रूरी समझना, या उसके लिए फ़िज़ूलख़र्ची करना ठीक नहीं। असल चीज़ है दिल से, यक़ीन के साथ, ख़ुद पढ़ना।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
आयत-ए-करीमा क्या है?
“ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन”, हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) की दुआ (सूरह अंबिया 21:87)।
आयत-ए-करीमा कब पढ़ें?
किसी भी परेशानी, ग़म, बीमारी, क़र्ज़ या मुश्किल में, और तौबा के वक़्त।
आयत-ए-करीमा कितनी बार पढ़नी चाहिए?
कोई तय गिनती हदीस में नहीं। जितना हो सके, दिल से पढ़ें।
क्या सवा लाख आयत-ए-करीमा पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं, ये गिनती हदीस से साबित नहीं, ये एक रिवाज है। पढ़ना अच्छा है, लेकिन ज़रूरी नहीं।
आयत-ए-करीमा की फ़ज़ीलत में कौन सी हदीस है?
तिर्मिज़ी (3505): कोई मुसलमान किसी भी मामले में इससे दुआ करे, अल्लाह क़बूल करता है।
क्या औरतें भी आयत-ए-करीमा पढ़ सकती हैं?
हाँ, हर मुसलमान पढ़ सकता है, अल्फ़ाज़ वही रहेंगे।
आख़िरी बात
जब हालात मछली के पेट जैसे अंधेरे लगें, तो याद रखें कि हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) को वहाँ से भी निकाला गया। आयत-ए-करीमा को अपनी ज़बान पर रखें, और अपनी ग़लतियों का इक़रार करके अल्लाह से मदद माँगें।